सावित्रीबाई फुले: भारत की पहली शिक्षिका, जिन्होंने खोले स्त्री शिक्षा के द्वार

“यदि पत्थर पूजने से होते बच्चे
तो फिर नाहक
नर-नारी शादी क्यों रचाते?”

ये पंक्तियाँ सावित्रीबाई फुले के मराठी कविता संग्रह ‘काव्य फुले’ से एक कविता का हिंदी अनुवाद है। इस कविता के माध्यम से सावित्रीबाई फुले अंधविश्वास और रूढ़ियों का खंडन कर लोगों को जागरूक करती हैं।

शूद्र और अति शूद्र
अज्ञान की वजह से पिछड़े
देव धर्म, रीति रिवाज़, अर्चना के कारण
अभावों से गिरकर में कंगाल हुए-

ये पंक्तियाँ सावित्रीबाई फुले के मराठी कविता संग्रह ‘काव्य फुले’ से एक कविता का हिंदी अनुवाद है.वे शूद्रों के दुख को, जाति के आधार पर प्रताड़ना के दुख को दो हजार साल से भी पुराना बताती है। सावित्रीबाई फुले इसका कारण मानती है कि इस धरती पर ब्राह्मणों ने अपने आप को स्वयं घोषित देवता बना लिया है और उसके माध्यम से यह स्वयं घोषित ब्राह्मण देवता अपनी मक्कारी और फरेब का जाल बिछाकर, उन्हें डरा-धमका कर रात-दिन अपनी सेवा करवाते है।

साल 1852 में  ‘काव्य फुले’ प्रकाशित हुआ था। यह वह समय था, जब भारत में लड़कियों, शूद्रों और दलितों को शिक्षा प्राप्त करने पर मनाही थी। दलितों और महिलाओं के इस शोषण के खिलाफ़ सावित्री बाई फुले ने आवाज़ उठाई। उन्होंने अपने पति ज्योतिबा फुले के समाज सुधार कार्यों में उनका कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया।

सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले एक प्रमुख भारतीय सामाजिक सुधारक, शिक्षाविद और कवियत्री थी. जिन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान महिला शिक्षा और सशक्तिकरण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उन्हें उस समय की कुछ साक्षर महिलाओं में गिना जाता है. सावित्रीबाई को पुणे में अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ भिडवाडा में स्कूल स्थापित किया. उन्होंने बाल विवाह के प्रति शिक्षित करने और उन्मूलन करने, सती प्रथा के खिलाफ प्रचार करने और विधवा पुनर्विवाह के लिए वकालात करने के लिए बहुत मेहनत की.उन्होंने अस्पृश्यता के खिलाफ अभियान चलाया और जाति व लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करने में सक्रिय रूप से काम किया.

सावित्रीबाई फुले का प्रारंभिक जीवन

सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी, 1831 को नायगांव (वर्तमान में सातारा जिले में) में कृषि परिवार में हुआ था. इनके पिता का नाम खंडोजी नेवसे पाटील और माता का नाम लक्ष्मी था. वे परिवार की सबसे बड़ी बेटी थी. उन दिनों की लड़कियों का जल्दी ही विवाह कर दिया जाता था, इसलिए प्रचलित रीति-रिवाजों के बाद नौ वर्षीय सावित्रीबाई की शादी 1840 में 12 वर्षीय ज्योतिराव फुले से साथ हुई. ज्योतिराव एक विचारक, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और जाति-विरोधी सामाजिक सुधारक थे. उन्हें महाराष्ट्र के सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रमुख आंदोलनकारियों में गिना जाता है. सावित्रीबाई की शिक्षा उनकी शादी के बाद शुरू हुई. यह उनके पति ही थे जिसने सावित्रीबाई को सीखने और लिखने के लिए प्रोत्साहित किया. उन्होंने एक सामान्य स्कूल से तीसरी और चौथी की परीक्षा पास की. जिसके बाद उन्होंने अहमदनगर में मिस फरार इंस्टीट्यूशन (Ms Farar’s Institution) में प्रशिक्षण लिया. ज्योतिराव अपने सभी सामाजिक प्रयासों में सावित्रीबाई के पक्ष में दृढ़ता से खड़े रहते थे.

तस्वीर साभार: drambedkarbooks.com

महिला शिक्षा और सशक्तिकरण में भूमिका

महज़ 17 साल की छोटी सी उम्र में ही सावित्रीबाई ने लड़कियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठा लिया था। उस दौर में समाज में कई महिला विरोधी सामाजिक कुरीतियां चरम पर थी, जैसे जातीय पहचान के आधार पर छुआछूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह, शिक्षा व्यवस्था में सामाजिक भेदभाव आदि। इन रूढ़ियों को तोड़कर महिलओं के हित में कई रास्ते बनाने का श्रेय सावित्रीबाई फूले को जाता है। उन्हें महिलाओं और दलितों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए जाना जाता है। ज्योतिराव, जो बाद में ज्योतिबा के नाम से जाने गए सावित्रीबाई के पति होने के साथ-साथ उनके जीवन के इस उद्देश्य में उनके हमसफ़र, हितैषी और समर्थक रहे। भारत में नारीवादी सोच की एक ठोस बुनियाद बनाने में सावित्रीबाई का साथ उनके पति ज्योतिबा ने दिया। उन्होंने न केवल कुप्रथाओं को पहचाना बल्कि विरोध किया और समाधान पेश किया।

सावित्रीबाई ने लड़कियों के लिए न सिर्फ पहला स्कूल ही खोला, बल्कि वे भारत की पहली महिला अध्यापिका बनीं। साल 1848 में पहला स्कूल शुरू करने के बाद फुले दंपत्ति की चुनौतियां बढ़ती गई। इससे ही जुड़ी एक घटना है जिसे सावित्रीबाई को याद करते हुए हमेशा इतिहास की स्मृति में दोहराया जाता है। सावित्रीबाई फुले ने पुणे शहर के भिड़ेवाडी में लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला था। सावित्रीबाई ने लड़कियों के लिए कुल 18 स्कूल खोले। उनके द्वारा स्थापित अठारहवां स्कूल भी पुणे में ही खोला गया था। जब भी सावित्रीबाई फुले स्कूल जाती थीं, लोग उनके इस कदम से नाराज़ होकर उनपर पत्थर और गोबर फेंका करते थे। सावित्रीबाई हर जाति जिसे समाज पढ़ाई-लिखाई करने के क़ाबिल नहीं समझता था उन तबक़ों से आती लड़कियों की शिक्षा की बड़ी पक्षधर थी। बालिकाओं के लिए स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था और सावित्रीबाई हर जाति की लड़कियों को शिक्षित करना चाहती थी। ऐसी शिक्षा व्यवस्था पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी।

सामाजिक मुश्किलों से फुले का रोज़ सामना होता रहा। ब्राह्मणवादी पितृसतात्मक सामाजिक व्यवस्था सावित्रीबाई से खफ़ा थी। लेकिन, वह पीछे नहीं हटी, वह पढ़ाने जाते हुए अपने साथ एक और साड़ी लेकर जाने लगी। जब उन पर पत्थर और गोबर फेंके जाते तब सावित्रीबाई फूले कहती थी, “मैं अपनी बहनों को पढ़ाने का काम करती हूं, इसलिए जो पत्थर और गोबर मुझपर फेंके जाते हैं वे मुझे फूल की तरह लगते हैं।” अपने मकसद से उन्हें कोई बाधा डिगा नहीं पाई। वह अपनी कविताओं और लेखों में हमेशा सामाजिक चेतना की बात करती थी। उनकी बहुत सी कविताएं ऐसी हैं जिससे शिक्षा के प्रति जागरूकता की प्रेरणा मिलती है। उन्होंने जाति तोड़ने और ब्राह्मण ग्रंथों से दूर रहने की बात की तरफ़ इशारा अपनी कविताओं में किया है। हर बिरादरी और धर्म के लिए उन्होंने काम किया।

फुले दम्पत्ति ने 28 जनवरी 1853 में अपने पड़ोसी मित्र और आंदोलन के साथी उस्मान शेख के घर में विधवाओं और गर्भवती महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की। इसकी पूरी जिम्मेदारी सावित्रीबाई ने संभाली। इस जगह ज़रूरतमंद गर्भवती महिलओं को रखा जाता, उनकी देखभाल की जाती थी। उनके बच्चे के पालनपोषण के लिए इस साथ में एक पालना घर बनाया था। मात्र 4 सालों के अंदर ही 100 से अधिक विधवा स्त्रियों ने इस गृह में बच्चों को जन्म दिया। 25 दिसंबर 1873 को सत्यशोधक समाज नामक संस्था ने अपने अंतर्गत पहला विधवा पुर्नविवाह करवाया। सत्यशोधक समाज की स्थापना उसी वर्ष सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले ने मिलकर की थी।

जब उन पर पत्थर और गोबर फेंके जाते तब सावित्रीबाई फूले कहती थी, “मैं अपनी बहनों को पढ़ाने का काम करती हूं, इसलिए जो पत्थर और गोबर मुझपर फेंके जाते हैं वे मुझे फूल की तरह लगते हैं।”

1890 में जब ज्योतिबा फुले ने अपनी आंखिरी सांस ली थी तब उनका अंतिम संस्कार भी खुद सावित्रीबाई फूले ने ही किया था जो आम तौर पर हमारे समाज में पुरुष द्वारा ही किया जाता है। ज्योतिबा के निधन के बाद सत्यशोधक समाज की जिम्मेदारी सावित्रीबाई फुले पर आ गई। उन्होंने इस जिम्मेदारी को बख़ूबी निभाया। इस संस्था ने विधवा विवाह की परंपरा को शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने की पहल तब की थी जब विधवाओं को सामाजिक गतिविधियों से निष्कर्ष रखा जाता था। उनके हिस्से ना तो जीवन के रंग थे ना जीवन साधारण रूप से व्यतीत करने की आज़ादी। साल 1892 में सावित्रीबाई ने विधवाओं के मदद के लिए एक संगठन बनाया। यह संगठन महिला सेवा मंडल के रूप में पुणे की विधवा स्त्रियों के आर्थिक विकास के लिए देश का पहला महिला संगठन कहलाया। संगठन की कार्यप्रणाली के अनुसार सावित्रीबाई सभी वंचित दलित और विधवा स्त्रियों से उनकी स्थिति पर चर्चा करतीं। उनकी समस्या सुनती, उनके साथ चर्चा करती और उसे दूर करने का उपाय सभी के साथ मिलकर ढूंढ़ती।

सावित्रीबाई फुले की मृत्यु

सावित्रीबाई के दत्तक पुत्र यशवंतराव ने एक डॉक्टर के रूप में लोगों की सेवा करना शुरू किया. जब 1897 में बुलेसोनिक प्लेग महामारी ने नालसपोरा और महाराष्ट्र के आसपास के इलाके को बुरी तरह प्रभावित किया, तो साहसी सावित्रीबाई और यशवंतराव ने बीमारी से संक्रमित रोगियों का इलाज करने के लिए पुणे के बाहरी इलाके में एक क्लिनिक खोला. वह इस महामारी से पीड़ितो को क्लीनिक में ले आती जहाँ उनका बेटा उन रोगियों का इलाज करता था. रोगियों की सेवा करते हुए वह खुद भी इस बीमारी की चपेट में आ गयी. 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई का निधन हो गया.

समाज की सदियों पुरानी बुराइयों पर अंकुश लगाने और उसके द्वारा छोड़ी गई अच्छी सुधारों की समृद्ध विरासत में सावित्रीबाई का अथक प्रयास पीढ़ियों को प्रेरित करता है. 1983 में पुणे सिटी कॉरपोरेशन द्वारा उनके सम्मान में एक स्मारक बनाया गया था. इंडिया पोस्ट ने 10 मार्च 1998 को उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था. 2015 में पुणे विश्वविद्यालय का नाम बदलकर उनके नाम पर सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय कर दिया गया था. सर्च इंजन गूगल ने 3 जनवरी 2017 को गूगल डूडल के साथ उनकी 186 वीं जयंती मनाई थी.

सावित्रीबाई फुले पर बनाया गया गूगल डूडल

Article References :

Feminisminindia

Wikipedia

Thebetterindia

0Shares

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *