भीमा कोरेगांव: भीमा-कोरेगांव युद्ध की पूरी कहानी

यह कहानी है 202 साल पहले 1 जनवरी, 1818 को हुए एक युद्ध की. जब पेशवा सेना महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में अंग्रेजों से हार गई थी. दावा किया जाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी को महार रेजीमेंट के सैनिकों की बहादुरी की वजह से यह जीत हासिल हुई थी. ऐसे में यह जगह पेशवाओं पर महारों यानी अनुसूचित जातियों की जीत के एक स्मारक के तौर पर स्थापित हो गई. इसीलिए बहुजन समुदाय के लोग भीमा कोरेगांव में हर साल बड़ी संख्या में जुटकर उन सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने पेशवा की सेना के खिलाफ लड़ते हुए अपने प्राण गंवाए थे.

भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की याद में बना विजय स्तंभ

बहुजन चिंतक और दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर रतन लाल कहते हैं कि पुणे के पास भीमा नदी के तट पर उस दिन जो हुआ था, उसका सिर्फ राजनीतिक और रणनीतिक महत्व नहीं है. उस दिन उस मैदान में सिर्फ अंग्रेज और पेशवा नहीं लड़ रहे थे. वहां जातिवाद के खिलाफ भी एक महासंग्राम हुआ था. इस लड़ाई में अछूत मानी जाने वाले महार ​जाति के सैनिकों ने जातिवादी पेशवाई को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद कर दिया. भारतीय समाज को लोकतांत्रिक और मानवीय बनाने में इस युद्ध ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

प्रो. रतनलाल के मुताबिक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया की 500 सैनिकों की एक छोटी कंपनी ने, जिसमें ज्यादातर सैनिक महार (अनुसूचित जाती ) थे, पेशवा शासक बाजीराव द्वितीय की 28,000 हजार की सेना को महज 12 घंटे चले युद्ध में पराजित कर दिया था. कोरेगांव के मैदान में जिन महार सैनिकों ने लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की, उनके सम्मान में सन 1822 ई. में भीमा नदी के किनारे काले पत्थरों के रणस्तंभ का निर्माण किया गया, जिन पर उनके नाम खुदे हैं. इस घटना को देश भर के बहुजन अपने इतिहास का एक वीरतापूर्ण प्रकरण मानते हैं. बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी यहां पहुंचकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी थी.

1950 में अपने जन्मदिन पर महार रेजिमेंट के जवानों के साथ अम्बेडकर

बहुजन के लिए महत्व!  

इस लड़ाई को बहुजन समाज के इतिहास में एक खास जगह मिल गई. बहुजन समाज के लोग इस लड़ाई में अपनी जीत मानते हैं. उनके मुताबिक इस लड़ाई में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अत्याचार करने वाले पेशवा की हार हुई थी.

बहुजन समाज के चिंतक और मेरठ यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सतीश प्रकाश के मुताबिक ‘भीमा-कोरेगांव की लड़ाई में अंग्रेजों की ओर से लड़ने वाले ज्यादातर सैनिक महाराष्ट्र की अनुसूचित जाति (महार जाति) से ताल्लुक रखते थे. महार शिवाजी के समय से ही मराठा सेना का हिस्सा रहे थे, लेकिन बाजीराव द्वितीय ने अपनी ब्राह्मणवादी सोच की वजह से उनको सेना में भर्ती करने से इनकार कर दिया था.’

इस जीत की वजह से ही हर साल जब 1 जनवरी को दुनिया भर में नए साल का जश्न मनाया जाता है उस वक्त अनुसूचित जाति समुदाय के लोग भीमा-कोरेगांव में जमा होते है. वो यहां ‘विजय स्तंभ’ के सामने अपना सम्मान प्रकट करते हैं. ये विजय स्तंभ ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस युद्ध में शामिल होने वाले लोगों की याद में बनाया था.

डॉ. सतीश प्रकाश के मुताबिक, ‘भीमा-कोरेगांव बहुजन समाज के सामाजिक आंदोलन के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उन्हें पता चलता है कि वो भी कभी योद्धा थे. क्योंकि उनकी इस पहचान को लगभग मिटा दिया गया है.

भीमा-कोरेगांव बहुजन का अस्मिता केंद्र कैसे बना?


बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर के पिता रामजी मालोजी सकपाल ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सूबेदार थे. उनके जन्म के 1 साल बाद मई 1892 में ब्रिटिश शासन ने सेना के लिए मार्शल रेस थ्योरी को अमल में लाना शुरू किया और मई 1892 से महार रेजिमेंट में नई भर्ती बंद कर दी गई.
बाबासाहेब अम्बेडकर महार जाति से आते थे. महाराष्ट्र की इस जाति का सैनिक इतिहास छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से शुरू होता है. छत्रपति शिवाजी महाराज दौर से आखिरी पेशवा तक महार मराठा सेना का हिस्सा रहे थे और किले की सुरक्षा की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर होती थी. पहले विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य को सैनिकों की जरूरत पड़ी. इस समय महार रेजिमेंट को फिर से शुरू किया गया. लेकिन 1918 में युद्ध के बंद होने के बाद महार रेजिमेंट को फिर से बंद कर दिया गया.

1927 में बाबासाहेब अम्बेडकर ने पहली दफा अंग्रेजों के सामने सेना में महारों को बहाल करने की मांग रखी. इस सिलसिले में वो पहली बार भीमा-कोरेगांव आए. इसके बाद वो कई दफा भीमा-कोरेगांव आए. 1941 में अपने एक भाषण में बाबासाहेब अम्बेडकर ने भीमा-कोरेगांव का जिक्र करते हुए कहा कि इस जगह महारों ने पेशवा को हराया था. ये बाबासाहेब अम्बेडकर थे, जिनकी वजह से भीमा-कोरेगांव बहुजन अस्मिता का केंद्र बन गया.

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